आदमी का ईमान कितना गिर गया है,
नहीं चाहते हुए भी इसका दिमाग फिर गया है,
क्या हो इस आदमी का यह सोच कर परेशान हूँ,
मै इसलिए सोचता हूँ, क्योंकी मैं भी एक इंसान हूँ।
आज का मानव, मानव नहीं है,
आज का मानव दानव हो गया है,
अत्याचार रोकने का नहीं,
अत्याचार करने का आदि हो गया है,
क्या हो इस आदमी का यह सोच कर परेशान हूँ,
मै इसलिए सोचता हूँ, क्योंकी मैं भी एक इंसान हूँ।
झूठ छुप नही सकती, बुरे किये कर्मो का,
यह चोरी की बात हो या किसी के क़त्ल का,
अरे ओ आदमी यहाँ कुछ बनने आये हो,
चाह कर, यहाँ कुछ करने आये हो,
क्या हो इस आदमी का यह सोच कर परेशान हूँ,
मै इसलिए सोचता हूँ, क्योंकी मैं भी एक इंसान हूँ।
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