कितनी अशांत है जिंदगी मेरी, इन्ही खयालो में खोये हुए,
आता है जाता है, बस इसी बनावटी मेलो में,
समझ यही रहे थे की बसजायेंगे इसी दुनिया में,
पर समझ कर यही रह गए की बस जायेंगे इस दुनिया से,
पर इस दुनिया में आदमी फिरता है मारा मारा ,
अक्सर यह तक़दीर ही देती है, ग़मों से उबरने का सहारा,
कितनी अशांत है जिंदगी मेरी, इन्ही खयालो में खोये हुए,
कांटे जो बनकर आये जिंदगी में, कष्ट से ज्यादा जख्म दे गए,
यही पर दोडता हुआ आदमी, जिंदगी से है हारा,
अक्सर यह तक़दीर ही देती है, ग़मों से उबरने का सहारा,
कितनी अशांत है जिंदगी मेरी, इन्ही खयालो में खोये हुए,
किस्मत अपनी साथ नहीं देती, ग़मों में डुबोती जाती है,
सुख की तलाश में दुःख ही सदेव प्राण लेती है,
इसीलिए रुपेश सदेव देता है यह नारा,
अक्सर यह तक़दीर ही देती है, ग़मों से उबरने का सहारा,
कितनी अशांत है जिंदगी मेरी, इन्ही खयालो में खोये हुए,
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