Friday, December 23, 2011

नहीं जान पाई मैं...

अपनी एहसासों को शब्द नही दे पाई मैं,
उनमे छुपे दर्द को नहीं कह पाई मैं,
सोचा था बिन कहे समझ जाओगे,
इतने अर्थहीन हो तुम नहीं जान पाई मैं.


पलके सजी हुई भी तब भी,
बहने से आंसू को रोका था तुमने,
लगा था जरुरत नही अब इनकी,
उम्र भर रुलाओगे तुम नहीं जान पाई मैं,

लौटी भी इन होठों की हंसी,
जिनकी राह दिखाई थी तुमने,
लगा था जिंदगी संवर गयी मेरी,
इस कदर बिगड़ जाओगे तुम नहीं जान पाई मैं.

खुद को ही नही समझ पाई मैं,
अपना अस्तित्व भी नहीं ढूढ़ पाई मैं,
सोचा था जिनकी वजह  बनोगे,
यूँ राह में छोड़ जाओगे तुम नहीं जान पाई मैं.

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