Friday, December 16, 2011

जिंदगी को जीते देखा हूँ मैं

कठिनाइयों के बीच खड़े होकर
जिंदगी को जीते देखा हूँ मैं,
अक्सर बीतते जिंदगी को ,
बिलखते देखा हूँ मैं,

तंग रास्तों पर डगर की तलाश में,
हजारों को गुमसुम देखा,
बस इन्ही गुमसुम रास्तों पर
आदमी को जीतते देखा हूँ मैं,

ये बदलती दुनिया को
दुनिया की खबर नही बस,
यही कहानी की आवाज़,
गूंजते देखा हूँ मैं,

डाल कर कोई आहट वक़्त का
नजरों से परे होता है,
बस इसी नजरों को अपने
आप पर झुकते देखा हूँ मैं।

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